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आरक्षण में भी बढ़ेंगे पुरुष सांसद
महिला आरक्षण लागू होने के बाद भी घटेगी नहीं पुरुषों की संख्या, सीटें बढ़ने से संसद में दोनों का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा
17 Apr 2026, 02:36 PM Delhi - New Delhi
Reporter : Mahesh Sharma
New Delhi

सीटें बढ़ने से बदलेगा संसद का पूरा गणित

महिला आरक्षण कानून लागू होने के बाद यह धारणा बन रही थी कि संसद में पुरुष सांसदों की संख्या कम हो जाएगी, लेकिन नया प्रस्ताव इस तस्वीर को पूरी तरह बदल देता है। सरकार द्वारा लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने की योजना ने पूरे समीकरण को नया मोड़ दे दिया है। इसका मतलब यह है कि जहां एक ओर 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी, वहीं कुल सीटों की संख्या बढ़ने से पुरुष सांसदों की वास्तविक संख्या भी घटने के बजाय बढ़ सकती है। यह बदलाव केवल प्रतिशत का खेल नहीं बल्कि कुल संख्या के विस्तार का परिणाम है, जिससे संसद का आकार और प्रतिनिधित्व दोनों व्यापक हो जाएंगे।


महिलाओं की हिस्सेदारी में ऐतिहासिक बढ़ोतरी तय

इस नए ढांचे में महिलाओं की भागीदारी निश्चित रूप से बढ़ेगी और यह भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव माना जा रहा है। अगर 850 सीटों का प्रस्ताव लागू होता है, तो लगभग 280 से अधिक सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकती हैं। वर्तमान में जहां महिला सांसदों की संख्या काफी सीमित है, वहीं इस बदलाव के बाद उनका प्रतिनिधित्व कई गुना बढ़ जाएगा। इससे नीति निर्माण में महिलाओं की भागीदारी मजबूत होगी और संसद में विविधता भी बढ़ेगी। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि यह बढ़ोतरी सीधे तौर पर सीटों के विस्तार से जुड़ी हुई है।


पुरुष सांसदों की संख्या क्यों नहीं घटेगी

सवाल यह उठता है कि जब 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी, तो पुरुष सांसदों की संख्या क्यों नहीं घटेगी। इसका सीधा जवाब कुल सीटों की संख्या में बढ़ोतरी है। उदाहरण के तौर पर, यदि पहले 543 सीटों में से 33 प्रतिशत महिलाओं के लिए आरक्षित होतीं, तो पुरुषों की संख्या घटती। लेकिन जब कुल सीटें 850 हो जाती हैं, तो शेष 67 प्रतिशत सीटें पुरुषों के लिए उपलब्ध रहेंगी, जो संख्या के हिसाब से पहले से ज्यादा हो सकती हैं। यानी प्रतिशत में कमी दिख सकती है, लेकिन कुल संख्या में वृद्धि संभव है।


जनगणना और परिसीमन से जुड़ा है पूरा मामला

यह पूरा बदलाव जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। सरकार का कहना है कि नई सीटों का निर्धारण नवीनतम जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर किया जाएगा, जिससे हर क्षेत्र को उचित प्रतिनिधित्व मिल सके। परिसीमन के जरिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय की जाएंगी और उसी आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होगा। इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ही महिला आरक्षण का प्रभाव पूरी तरह दिखाई देगा। यही वजह है कि इस कानून के लागू होने के बावजूद इसके वास्तविक असर को देखने में समय लग सकता है।


राजनीतिक दलों के लिए नई रणनीति की चुनौती

इस बदलते समीकरण ने सभी राजनीतिक दलों के सामने नई रणनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। अब उन्हें न केवल महिला उम्मीदवारों को प्राथमिकता देनी होगी, बल्कि बढ़ी हुई सीटों के हिसाब से अपने संगठन और चुनावी रणनीति को भी नया रूप देना होगा। इससे टिकट वितरण, क्षेत्रीय समीकरण और चुनावी गठजोड़ सब पर असर पड़ेगा। राजनीतिक दलों को अब संतुलन बनाते हुए नए सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखना होगा।


लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का दायरा होगा व्यापक

कुल मिलाकर, यह बदलाव भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़े विस्तार के रूप में देखा जा रहा है। संसद में अधिक सीटें होने का मतलब है कि ज्यादा लोगों को प्रतिनिधित्व का अवसर मिलेगा। महिला आरक्षण के साथ-साथ सीटों का विस्तार एक ऐसा कदम है, जो प्रतिनिधित्व को संतुलित और समावेशी बना सकता है। हालांकि इसके क्रियान्वयन और राजनीतिक प्रभाव को लेकर बहस जारी है, लेकिन इतना तय है कि यह फैसला भारतीय राजनीति की दिशा को आने वाले वर्षों में गहराई से प्रभावित करेगा।


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