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पाकिस्तान की बढ़ती सक्रियता
इज़रायल ने तुर्की को क्षेत्रीय खतरे के रूप में देखा
तुर्की-सऊदी समीकरण पर इज़रायल की चिंता, पाकिस्तान की भूमिका से बढ़ी मध्य-पूर्व हलचल
19 Feb 2026, 11:25 AM
Tel Aviv District -
Tel Aviv
Reporter :
Mahesh Sharma
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Tel Aviv पश्चिम एशिया की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर में दिखाई दे रही है। हाल के बयानों और कूटनीतिक गतिविधियों ने संकेत दिया है कि क्षेत्र में नए समीकरण आकार ले रहे हैं। विशेष रूप से तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकियों को लेकर इज़रायल की चिंताएं खुलकर सामने आई हैं।
इज़रायल के पूर्व प्रधानमंत्री नेफ्ताली बेनेट ने तुर्की को “नया ईरान” करार देते हुए चेतावनी दी है कि क्षेत्र में एक नई ‘सुन्नी धुरी’ उभर सकती है। उनके अनुसार, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोगन ऐसी रणनीति पर काम कर रहे हैं जो धीरे-धीरे इज़रायल के सामरिक हितों को चुनौती दे सकती है।
बेनेट का दावा है कि तुर्की, कतर और पाकिस्तान के बीच बढ़ती सामरिक और राजनीतिक नजदीकियां भविष्य में एक समन्वित मोर्चे का रूप ले सकती हैं। खासतौर पर पाकिस्तान की भूमिका को लेकर इज़रायल के रणनीतिक विश्लेषकों में चर्चा तेज हो गई है। पाकिस्तान पहले ही परमाणु क्षमता से लैस देश है और उसके किसी भी क्षेत्रीय गठबंधन में सक्रिय होने से शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है।
सऊदी अरब का रुख भी इस पूरे घटनाक्रम में अहम माना जा रहा है। बीते वर्षों में इज़रायल और सऊदी अरब के बीच संबंधों में नरमी के संकेत मिले थे, लेकिन हालिया चर्चाओं में यह बात सामने आई है कि सऊदी नेतृत्व अपनी स्वतंत्र सुरक्षा और परमाणु क्षमता को लेकर गंभीर है। अमेरिका के साथ संभावित परमाणु समझौते की खबरों ने इस बहस को और तेज कर दिया है।
तुर्की और पाकिस्तान के बीच समुद्री सहयोग, विशेषकर कराची तट के आसपास सामरिक गतिविधियों की खबरें, इज़रायल के लिए चिंता का विषय बन गई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि लाल सागर और हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति भविष्य के संघर्षों की दिशा तय कर सकती है।
हालांकि तुर्की और सऊदी अरब ने औपचारिक रूप से किसी ‘सुन्नी एक्सिस’ की पुष्टि नहीं की है, लेकिन कूटनीतिक संकेतों और सैन्य सहयोग की खबरों ने अटकलों को जन्म दिया है। क्षेत्रीय राजनीति में ईरान पहले से ही इज़रायल का प्रमुख विरोधी रहा है, ऐसे में यदि कोई नया सामरिक गठबंधन बनता है तो मध्य-पूर्व की शक्ति संरचना में बड़ा बदलाव संभव है।
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल यह कूटनीतिक बयानबाजी और रणनीतिक तैयारी का दौर है, लेकिन आने वाले महीनों में इन संबंधों की दिशा स्पष्ट हो सकती है। पश्चिम एशिया की राजनीति में हर नया गठजोड़ वैश्विक शक्तियों की दिलचस्पी और हस्तक्षेप को भी बढ़ाता है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या यह केवल राजनीतिक बयान हैं या वास्तव में एक नई क्षेत्रीय धुरी आकार ले रही है। आने वाला समय ही इस उभरते समीकरण की असली तस्वीर सामने लाएगा।
इज़रायल के पूर्व प्रधानमंत्री नेफ्ताली बेनेट ने तुर्की को “नया ईरान” करार देते हुए चेतावनी दी है कि क्षेत्र में एक नई ‘सुन्नी धुरी’ उभर सकती है। उनके अनुसार, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोगन ऐसी रणनीति पर काम कर रहे हैं जो धीरे-धीरे इज़रायल के सामरिक हितों को चुनौती दे सकती है।
बेनेट का दावा है कि तुर्की, कतर और पाकिस्तान के बीच बढ़ती सामरिक और राजनीतिक नजदीकियां भविष्य में एक समन्वित मोर्चे का रूप ले सकती हैं। खासतौर पर पाकिस्तान की भूमिका को लेकर इज़रायल के रणनीतिक विश्लेषकों में चर्चा तेज हो गई है। पाकिस्तान पहले ही परमाणु क्षमता से लैस देश है और उसके किसी भी क्षेत्रीय गठबंधन में सक्रिय होने से शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है।
सऊदी अरब का रुख भी इस पूरे घटनाक्रम में अहम माना जा रहा है। बीते वर्षों में इज़रायल और सऊदी अरब के बीच संबंधों में नरमी के संकेत मिले थे, लेकिन हालिया चर्चाओं में यह बात सामने आई है कि सऊदी नेतृत्व अपनी स्वतंत्र सुरक्षा और परमाणु क्षमता को लेकर गंभीर है। अमेरिका के साथ संभावित परमाणु समझौते की खबरों ने इस बहस को और तेज कर दिया है।
तुर्की और पाकिस्तान के बीच समुद्री सहयोग, विशेषकर कराची तट के आसपास सामरिक गतिविधियों की खबरें, इज़रायल के लिए चिंता का विषय बन गई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि लाल सागर और हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति भविष्य के संघर्षों की दिशा तय कर सकती है।
हालांकि तुर्की और सऊदी अरब ने औपचारिक रूप से किसी ‘सुन्नी एक्सिस’ की पुष्टि नहीं की है, लेकिन कूटनीतिक संकेतों और सैन्य सहयोग की खबरों ने अटकलों को जन्म दिया है। क्षेत्रीय राजनीति में ईरान पहले से ही इज़रायल का प्रमुख विरोधी रहा है, ऐसे में यदि कोई नया सामरिक गठबंधन बनता है तो मध्य-पूर्व की शक्ति संरचना में बड़ा बदलाव संभव है।
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल यह कूटनीतिक बयानबाजी और रणनीतिक तैयारी का दौर है, लेकिन आने वाले महीनों में इन संबंधों की दिशा स्पष्ट हो सकती है। पश्चिम एशिया की राजनीति में हर नया गठजोड़ वैश्विक शक्तियों की दिलचस्पी और हस्तक्षेप को भी बढ़ाता है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या यह केवल राजनीतिक बयान हैं या वास्तव में एक नई क्षेत्रीय धुरी आकार ले रही है। आने वाला समय ही इस उभरते समीकरण की असली तस्वीर सामने लाएगा।