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नेपाल में युवाओं ने चेतावनी दी
प्रधानमंत्री चेतावनी Gen-Z नाराज़गी संसाधन पर एकाधिकार चुनाव से पहले
प्रधानमंत्री सुशीला कार्की चेतावनी देतीं युवाओं की नाराज़गी से बगावत हो सकती है
19 Feb 2026, 02:27 PM
Central Region -
Panauti
Reporter :
Mahesh Sharma
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Panauti पोखरा: नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने गुरुवार को चेतावनी दी है कि युवाओं की नाराज़गी को समय पर दूर न किया गया तो देश में एक और बगावत (Rebellion Part-2) हो सकती है। यह बयान देश में 5 मार्च को होने वाले हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव्स के चुनावों से ठीक 15 दिन पहले आया है।
गुरुवार को काठमांडू स्थित नेपाली आर्मी पवेलियन में 76वें डेमोक्रेसी डे के अवसर पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र केवल संस्थागत रूप से नहीं, बल्कि परिणाम देकर जनता को विश्वास दिलाने वाला होना चाहिए। उन्होंने कहा, “सरकार को युवाओं की नाराज़गी का जवाब न केवल उदारता के साथ देना चाहिए, बल्कि विनम्रता और कर्तव्य की गहरी भावना से भी देना चाहिए।”
प्रधानमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि सत्ता और संसाधनों पर एकाधिकार ने आम नागरिकों का भरोसा कमजोर कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप पिछले साल हुए Gen-Z प्रोटेस्ट ने पूरे देश को झकझोर दिया था। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि युवाओं की नाराज़गी को नजरअंदाज किया गया, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर हो सकती है और संभावित बगावत की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
नेपाल में डेमोक्रेसी की स्थापना 1950 की क्रांति से हुई थी, जिसने राणा प्रधानमंत्रियों के 104 साल पुराने खानदानी शासन को समाप्त किया और राजा को केवल प्रतीकात्मक भूमिका दी। पिछले साल Gen-Z युवाओं ने व्यापक विरोध किया, जो इस लोकतंत्र की कमजोरियों और बेरोजगारी, सामाजिक असमानता, और भ्रष्टाचार को उजागर करता है। यह आंदोलन अत्यधिक हिंसक नहीं था, लेकिन उसने राजनीतिक स्थिरता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी चुनाव युवा मतदाताओं की नाराज़गी को संबोधित करने का सबसे बड़ा मौका होगा। यदि पार्टियाँ और सरकार उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं लेंगी, तो राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ सकती है। प्रधानमंत्री ने नेताओं से अपील की कि वे युवाओं के मुद्दों पर ध्यान दें और संसाधनों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करें।
नेपाल के राजनीतिक विश्लेषक चेतावनी दे रहे हैं कि Gen-Z की सक्रियता और सोशल मीडिया पर उनकी आवाज़ ने देश में नई राजनीतिक चेतना पैदा कर दी है। अगर युवाओं की उम्मीदों को नजरअंदाज किया गया, तो Part-2 बगावत की आशंका वास्तविक रूप ले सकती है।
सुशीला कार्की का यह बयान स्पष्ट संकेत है कि सरकार युवा मतदाताओं और आम नागरिकों की भावनाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकती। देश के लिए यह समय चुनौतीपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र की सफलता केवल चुनाव जीतने से नहीं, बल्कि जनविश्वास बनाए रखने से तय होती है।
गुरुवार को काठमांडू स्थित नेपाली आर्मी पवेलियन में 76वें डेमोक्रेसी डे के अवसर पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र केवल संस्थागत रूप से नहीं, बल्कि परिणाम देकर जनता को विश्वास दिलाने वाला होना चाहिए। उन्होंने कहा, “सरकार को युवाओं की नाराज़गी का जवाब न केवल उदारता के साथ देना चाहिए, बल्कि विनम्रता और कर्तव्य की गहरी भावना से भी देना चाहिए।”
प्रधानमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि सत्ता और संसाधनों पर एकाधिकार ने आम नागरिकों का भरोसा कमजोर कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप पिछले साल हुए Gen-Z प्रोटेस्ट ने पूरे देश को झकझोर दिया था। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि युवाओं की नाराज़गी को नजरअंदाज किया गया, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर हो सकती है और संभावित बगावत की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
नेपाल में डेमोक्रेसी की स्थापना 1950 की क्रांति से हुई थी, जिसने राणा प्रधानमंत्रियों के 104 साल पुराने खानदानी शासन को समाप्त किया और राजा को केवल प्रतीकात्मक भूमिका दी। पिछले साल Gen-Z युवाओं ने व्यापक विरोध किया, जो इस लोकतंत्र की कमजोरियों और बेरोजगारी, सामाजिक असमानता, और भ्रष्टाचार को उजागर करता है। यह आंदोलन अत्यधिक हिंसक नहीं था, लेकिन उसने राजनीतिक स्थिरता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी चुनाव युवा मतदाताओं की नाराज़गी को संबोधित करने का सबसे बड़ा मौका होगा। यदि पार्टियाँ और सरकार उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं लेंगी, तो राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ सकती है। प्रधानमंत्री ने नेताओं से अपील की कि वे युवाओं के मुद्दों पर ध्यान दें और संसाधनों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करें।
नेपाल के राजनीतिक विश्लेषक चेतावनी दे रहे हैं कि Gen-Z की सक्रियता और सोशल मीडिया पर उनकी आवाज़ ने देश में नई राजनीतिक चेतना पैदा कर दी है। अगर युवाओं की उम्मीदों को नजरअंदाज किया गया, तो Part-2 बगावत की आशंका वास्तविक रूप ले सकती है।
सुशीला कार्की का यह बयान स्पष्ट संकेत है कि सरकार युवा मतदाताओं और आम नागरिकों की भावनाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकती। देश के लिए यह समय चुनौतीपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र की सफलता केवल चुनाव जीतने से नहीं, बल्कि जनविश्वास बनाए रखने से तय होती है।