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नए लेबर कोड से बदलेगा नौकरी और वेतन ढांचा
देश में लंबे समय से चर्चा में रहे नए लेबर कोड से जुड़े नियम अब अधिसूचित कर दिए गए हैं. इसके साथ ही नौकरी, वेतन, कार्य समय और कर्मचारी सुविधाओं से जुड़े कई बड़े बदलाव लागू होने की दिशा में बढ़ गए हैं. सरकार का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य श्रम व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित और आधुनिक बनाना है. नए नियमों के तहत कर्मचारियों के वेतन ढांचे, पीएफ, ग्रेच्युटी और कार्यस्थल की प्रक्रियाओं में बदलाव देखने को मिल सकता है. सबसे ज्यादा चर्चा काम के घंटों और सैलरी स्ट्रक्चर को लेकर हो रही है. नई व्यवस्था के तहत सप्ताह में कुल 48 घंटे काम का प्रावधान रखा गया है. कंपनियां जरूरत के अनुसार कार्यदिवसों और शिफ्टों में बदलाव कर सकेंगी. इसके साथ ही बेसिक सैलरी को कुल वेतन का कम से कम 50 प्रतिशत रखना अनिवार्य किया गया है. इससे कर्मचारियों की रिटायरमेंट बचत बढ़ सकती है, लेकिन कई लोगों की हाथ में मिलने वाली सैलरी कम होने की आशंका भी जताई जा रही है. श्रम विशेषज्ञों का मानना है कि इन बदलावों का असर निजी कंपनियों और संगठित क्षेत्र में सबसे ज्यादा दिखाई देगा.
बेसिक सैलरी बढ़ने से PF और ग्रेच्युटी पर असर
नए नियमों के अनुसार कर्मचारियों की बेसिक सैलरी अब कुल सीटीसी का कम से कम आधा हिस्सा होगी. अभी कई कंपनियां भत्तों के जरिए बेसिक वेतन कम रखती थीं, जिससे पीएफ और ग्रेच्युटी का बोझ घट जाता था. लेकिन नए नियम लागू होने के बाद कंपनियों को वेतन संरचना में बदलाव करना होगा. इसका सीधा असर पीएफ योगदान और ग्रेच्युटी की राशि पर पड़ेगा. कर्मचारी और कंपनी दोनों का पीएफ अंशदान बढ़ सकता है. इससे कर्मचारियों की भविष्य निधि में अधिक रकम जमा होगी और रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा बेहतर हो सकती है. हालांकि दूसरी ओर हाथ में मिलने वाली मासिक सैलरी कम हो सकती है क्योंकि अधिक हिस्सा कटौतियों में जाएगा. कई कंपनियां इस बदलाव के बाद अपने वेतन पैकेज और रोजगार नीतियों की समीक्षा कर रही हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय में यह व्यवस्था कर्मचारियों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है क्योंकि इससे सामाजिक सुरक्षा मजबूत होगी.
48 घंटे काम और लचीली कार्य व्यवस्था का प्रावधान
नए श्रम नियमों के तहत सप्ताह में कुल 48 घंटे काम का प्रावधान रखा गया है. हालांकि कंपनियों को कार्यदिवस तय करने में लचीलापन दिया गया है. यानी कोई कंपनी कर्मचारियों से चार दिन में ज्यादा घंटे काम लेकर तीन दिन की छुट्टी दे सकती है, जबकि कुछ संस्थान पहले की तरह छह दिन काम और एक दिन अवकाश का मॉडल जारी रख सकते हैं. सरकार का कहना है कि यह व्यवस्था बदलती कारोबारी जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई गई है. कई कॉर्पोरेट कंपनियां और आईटी सेक्टर पहले से ही हाइब्रिड और फ्लेक्सिबल मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं. ऐसे में नया कोड कंपनियों को अधिक स्वतंत्रता देगा. हालांकि कर्मचारी संगठनों ने लंबे कार्य घंटों को लेकर चिंता भी जताई है. उनका कहना है कि इससे कर्मचारियों पर मानसिक और शारीरिक दबाव बढ़ सकता है. दूसरी ओर उद्योग जगत इसे उत्पादकता और संसाधन प्रबंधन के लिए बेहतर कदम बता रहा है. आने वाले समय में विभिन्न क्षेत्रों में कार्यशैली में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं.
छंटनी और सेवा शर्तों को लेकर सख्त नियम
नए लेबर कोड में छंटनी और सेवा शर्तों को लेकर भी कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए हैं. नियमों के अनुसार यदि किसी कंपनी को कर्मचारियों की सेवा शर्तों में बदलाव करना है तो उसे कम से कम 21 दिन पहले नोटिस देना होगा. इसके अलावा 50 से 299 कर्मचारियों की छंटनी की स्थिति में सरकार को सूचना देना अनिवार्य होगा. श्रमिक संगठनों का कहना है कि इससे कर्मचारियों को कुछ हद तक सुरक्षा मिलेगी. वहीं कंपनियों का मानना है कि नई प्रक्रिया से प्रशासनिक जिम्मेदारियां बढ़ेंगी. नए नियमों में विवाद समाधान और शिकायत निवारण की प्रक्रिया को भी अधिक व्यवस्थित बनाने की बात कही गई है. सरकार का दावा है कि इससे कर्मचारियों और कंपनियों के बीच पारदर्शिता बढ़ेगी और श्रम विवादों में कमी आएगी. उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियों को अब मानव संसाधन नीतियों में व्यापक बदलाव करने पड़ सकते हैं ताकि वे नए नियमों के अनुरूप काम कर सकें.
महिलाओं के लिए नाइट शिफ्ट में नए प्रावधान
नए श्रम कोड में महिलाओं के रोजगार से जुड़े नियमों में भी महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं. अब महिलाओं को सभी क्षेत्रों और शिफ्टों में काम करने की अनुमति दी गई है, जिसमें नाइट शिफ्ट भी शामिल है. हालांकि इसके लिए कंपनियों को सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी. नियमों के अनुसार सुबह छह बजे से पहले और शाम सात बजे के बाद काम कराने की स्थिति में सुरक्षा, परिवहन और निगरानी के पर्याप्त इंतजाम अनिवार्य होंगे. सरकार का कहना है कि यह कदम महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और उन्हें समान अवसर देने के उद्देश्य से उठाया गया है. कॉर्पोरेट और सेवा क्षेत्र में इसे सकारात्मक बदलाव माना जा रहा है. कई कंपनियां पहले से ही महिला कर्मचारियों के लिए विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू कर चुकी हैं. नए नियमों के बाद इन व्यवस्थाओं को और मजबूत करने की जरूरत होगी. महिला कर्मचारी संगठनों ने इसे रोजगार अवसर बढ़ाने वाला कदम बताया है, हालांकि उन्होंने सुरक्षा उपायों के सख्ती से पालन की मांग भी की है.
कर्मचारियों और कंपनियों दोनों के लिए बड़ा बदलाव
नए लेबर कोड को देश की श्रम व्यवस्था में बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है. इससे कर्मचारियों और कंपनियों दोनों की कार्यशैली प्रभावित होगी. एक तरफ कर्मचारियों को बेहतर सामाजिक सुरक्षा और भविष्य निधि का लाभ मिलने की उम्मीद है, वहीं कंपनियों को नई अनुपालन प्रक्रिया और वेतन संरचना के अनुसार खुद को ढालना होगा. विशेषज्ञों का कहना है that आने वाले महीनों में निजी क्षेत्र में कई कंपनियां अपने एचआर सिस्टम, वेतन मॉडल और कार्य नीतियों में बदलाव कर सकती हैं. सरकार का दावा है कि इससे रोजगार व्यवस्था अधिक पारदर्शी और संगठित बनेगी. हालांकि कुछ कर्मचारी संगठनों ने कार्य घंटों और इन-हैंड सैलरी घटने की आशंका पर चिंता जताई है. फिलहाल उद्योग जगत और कर्मचारियों दोनों की नजर इस बात पर टिकी है कि इन नियमों को जमीन पर किस तरह लागू किया जाता है और उनका वास्तविक असर क्या होता है.
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