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जयशंकर का यूरोप पर प्रहार
फिनलैंड में जयशंकर का तीखा संदेश, यूरोप के दोहरे मानदंडों और हथियार नीति पर उठाए सवाल
12 Jun 2026, 03:54 PM -
Reporter : Mahesh Sharma

ऊर्जा सुरक्षा पर भारत का स्पष्ट पक्ष

फिनलैंड में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय संवाद कार्यक्रम के दौरान भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक मंच से देश की ऊर्जा नीति का मजबूती से बचाव किया। रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर पश्चिमी देशों की ओर से उठाए जाने वाले सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों और ऊर्जा आवश्यकताओं के आधार पर निर्णय लेता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब वैश्विक बाजार अस्थिर था और ऊर्जा संकट गहराया हुआ था, तब भारत को अपने नागरिकों की जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए व्यवहारिक फैसले लेने पड़े। उन्होंने कहा कि किसी भी सरकार का पहला दायित्व अपने लोगों की आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है।

यूरोप के दोहरे मानदंडों पर सवाल

अपने संबोधन के दौरान विदेश मंत्री ने पश्चिमी देशों की आलोचना करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक समान मानदंड अपनाए जाने चाहिए। उन्होंने इशारों में कहा कि कुछ देश दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं, लेकिन अपने हितों के अनुरूप अलग रवैया अपनाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत पर हमला करने वाले देशों तक यूरोपीय हथियार पहुंचने के उदाहरण मौजूद रहे हैं। ऐसे में केवल भारत के फैसलों पर सवाल उठाना उचित नहीं कहा जा सकता। उनका यह बयान कूटनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया और इसे भारत के आत्मविश्वासी विदेश नीति दृष्टिकोण के रूप में देखा गया।

वैश्विक संकटों में व्यवहारिक दृष्टिकोण

विदेश मंत्री ने कहा कि रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान ऊर्जा बाजार में अभूतपूर्व अस्थिरता देखी गई। ऐसे समय में तेल की उपलब्धता और कीमत दोनों देशों के लिए बड़ी चुनौती बन गई थीं। भारत ने किसी राजनीतिक दबाव के बजाय आर्थिक व्यवहारिकता के आधार पर निर्णय लिए। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों की वास्तविकताओं को समझे बिना उन पर आरोप लगाना उचित नहीं है। भारत ने हमेशा संतुलित और जिम्मेदार रुख अपनाया है तथा अंतरराष्ट्रीय कानून और संवाद के माध्यम से समाधान का समर्थन किया है।

राष्ट्रीय हित सर्वोपरि रखने का संदेश

जयशंकर ने अपने वक्तव्य में यह स्पष्ट संकेत दिया कि भारत अब वैश्विक मंचों पर अपने हितों को बिना किसी झिझक के सामने रखता है। उन्होंने कहा कि दुनिया तेजी से बदल रही है और हर देश को अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार फैसले लेने का अधिकार है। भारत की विदेश नीति का मूल आधार रणनीतिक स्वायत्तता है, जिसके तहत देश किसी एक धड़े का हिस्सा बनने के बजाय स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता बनाए रखता है। उन्होंने यह भी दोहराया कि भारत की नीतियां किसी के खिलाफ नहीं बल्कि अपने नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए बनाई जाती हैं।

कूटनीतिक बयान के व्यापक मायने

विशेषज्ञों का मानना है कि विदेश मंत्री का यह वक्तव्य केवल रूस से तेल खरीदने का बचाव भर नहीं था, बल्कि यह बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन के बीच भारत की बढ़ती भूमिका का संकेत भी है। भारत आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और ऊर्जा जरूरतों के मामले में भी उसकी आवश्यकताएं विशाल हैं। ऐसे में नई दिल्ली का यह संदेश महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में समानता, पारदर्शिता और पारस्परिक सम्मान की भावना आवश्यक है। किसी भी देश की परिस्थितियों को समझे बिना उस पर दबाव बनाना समाधान नहीं हो सकता।

वैश्विक मंच पर मुखर होता भारत

फिनलैंड में दिया गया यह बयान भारत की आत्मनिर्भर और संतुलित विदेश नीति की झलक प्रस्तुत करता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर स्वतंत्र रुख अपनाया है और अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने का संदेश दिया है। विदेश मंत्री के शब्दों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत वैश्विक मंचों पर अपनी बात दृढ़ता के साथ रखने से पीछे नहीं हटेगा। आने वाले समय में ऊर्जा सुरक्षा, भू-राजनीतिक चुनौतियों और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के बीच भारत की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने की संभावना है। ऐसे में यह बयान केवल तत्कालीन विवाद का जवाब नहीं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक कूटनीतिक सोच का भी प्रतिबिंब माना जा रहा है।

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