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कच्चे तेल की तेजी से बढ़ी घरेलू बाजार की चिंता
देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार दूसरी बार बढ़ोतरी होने के बाद आम लोगों की चिंता बढ़ गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल का असर अब सीधे भारतीय बाजार पर दिखाई देने लगा है। बीते कुछ दिनों में वैश्विक हालात तेजी से बदले हैं, जिसके कारण तेल सप्लाई को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई है। इसी वजह से सरकारी तेल कंपनियों ने ईंधन के दाम बढ़ाने का फैसला लिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव और गहराता है तो आने वाले दिनों में तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है। इसका असर सिर्फ वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि परिवहन लागत बढ़ने से खाने-पीने की वस्तुओं और जरूरी सामानों की कीमतें भी प्रभावित हो सकती हैं।
लंबे समय बाद लगातार हो रही बढ़ोतरी ने लोगों को 2022 की याद दिला दी है, जब तेल कंपनियों ने लगभग रोजाना 80 से 90 पैसे प्रति लीटर तक कीमतें बढ़ाई थीं। अब एक बार फिर उसी तरह के फॉर्मूले को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। आम उपभोक्ता यह जानना चाहता है कि क्या आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल और ज्यादा महंगे होंगे।
मिडिल ईस्ट तनाव बना सबसे बड़ा कारण
विशेषज्ञों के अनुसार पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने पूरी दुनिया के तेल बाजार को प्रभावित किया है। समुद्री मार्गों पर संकट और कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर बनी अनिश्चितता ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढ़ा दिए हैं। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, इसलिए वैश्विक बदलाव का सीधा असर घरेलू कीमतों पर पड़ता है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने तेल आयात के कई नए स्रोत तलाशे हैं, लेकिन इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों से पूरी तरह बच पाना संभव नहीं हो पाया है। तेल कंपनियां लंबे समय तक घाटा सहन करने की स्थिति में नहीं रहतीं, इसलिए बाजार की परिस्थितियों के हिसाब से कीमतों में बदलाव किया जाता है।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो सरकार पर टैक्स घटाने का दबाव भी बढ़ सकता है। हालांकि इससे सरकारी राजस्व प्रभावित होने की आशंका रहती है। ऐसे में सरकार और तेल कंपनियों के सामने संतुलन बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है।
2022 वाला ‘90 पैसे फॉर्मूला’ फिर चर्चा में
देश में तेल कीमतों में बढ़ोतरी के साथ ही 2022 के उस दौर की चर्चा फिर शुरू हो गई है, जब लगभग रोजाना पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ते थे। उस समय कई शहरों में तेल की कीमतों में रोज 80 से 90 पैसे प्रति लीटर तक इजाफा देखा गया था। लगातार बढ़ोतरी से आम जनता और ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर भारी दबाव पड़ा था।
अब जब चार साल बाद फिर से कीमतें बढ़ने लगी हैं, तो बाजार में यह सवाल उठ रहा है कि क्या तेल कंपनियां उसी रणनीति को दोबारा अपनाएंगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में राहत नहीं मिली तो तेल कंपनियां धीरे-धीरे कीमतें बढ़ाने का रास्ता अपना सकती हैं।
हालांकि कुछ जानकारों का मानना है कि सरकार जनता पर ज्यादा बोझ नहीं डालना चाहेगी, क्योंकि लगातार महंगाई पहले ही लोगों की जेब पर असर डाल रही है। ऐसे में आने वाले कुछ सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। अगर कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचता है, तो कीमतों में और बड़ा बदलाव संभव है।
महंगाई बढ़ने से आम लोगों की मुश्किलें गहराईं
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि का सबसे बड़ा असर आम जनता पर पड़ता है। निजी वाहन चलाने वालों से लेकर सार्वजनिक परिवहन तक सभी क्षेत्रों में लागत बढ़ जाती है। इसके कारण सब्जियों, दूध, राशन और अन्य जरूरी सामानों की ढुलाई महंगी हो जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं तो आने वाले महीनों में खुदरा महंगाई दर पर भी असर देखने को मिल सकता है। परिवहन क्षेत्र पहले ही लागत बढ़ने की शिकायत कर रहा है। कई राज्यों में टैक्सी और ऑटो यूनियनों ने किराया बढ़ाने की मांग भी तेज कर दी है।
मध्यम वर्ग और छोटे व्यापारियों पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। रोजाना यात्रा करने वाले कर्मचारियों और छोटे व्यवसाय संचालकों का मासिक बजट बिगड़ने लगा है। यही कारण है कि तेल कीमतों का मुद्दा हमेशा आर्थिक और राजनीतिक बहस का केंद्र बन जाता है।
तेल कंपनियों के मुनाफे-घाटे पर भी बहस तेज
तेल कीमतों में बढ़ोतरी के बीच सरकारी तेल कंपनियों की आर्थिक स्थिति को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक कीमतें स्थिर रहने से कंपनियों पर वित्तीय दबाव बढ़ा था। ऐसे में अब कंपनियां धीरे-धीरे नुकसान की भरपाई करना चाहती हैं।
जानकारों के मुताबिक प्रति लीटर एक रुपये की बढ़ोतरी से तेल कंपनियों की आय में हजारों करोड़ रुपये का सुधार हो सकता है। यही वजह है कि बाजार विश्लेषक आने वाले समय में कीमतों की दिशा पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
हालांकि विपक्षी दल और उपभोक्ता संगठन इस मुद्दे पर सरकार और कंपनियों दोनों को घेर रहे हैं। उनका कहना है कि आम जनता पर बोझ डालने के बजाय टैक्स में राहत देकर कीमतों को नियंत्रित किया जाना चाहिए। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बन सकता है।
सरकार और उपभोक्ताओं की नजर अगले फैसलों पर
देशभर में लोग अब इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि आने वाले दिनों में तेल कंपनियां और सरकार क्या कदम उठाती हैं। यदि वैश्विक हालात सामान्य होते हैं तो कीमतों में राहत मिल सकती है, लेकिन तनाव बढ़ने पर और महंगाई की आशंका बनी रहेगी।
आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि सरकार फिलहाल स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए है। जरूरत पड़ने पर टैक्स कटौती या अन्य राहत उपायों पर विचार किया जा सकता है। हालांकि अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक संकेत सामने नहीं आया है।
फिलहाल पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार का रुख ही तय करेगा कि देश में ईंधन की कीमतें स्थिर रहेंगी या फिर महंगाई का नया दौर शुरू होगा।
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