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सस्ते घरों का संकट बढ़ा
देश में सस्ते मकानों का संकट गहराया, लाखों आवासीय परियोजनाएं अधूरी, मध्यम वर्ग के घर खरीदने का सपना मुश्किल
21 May 2026, 04:53 PM Maharashtra - Mumbai
Reporter : Mahesh Sharma
Mumbai

देश में सस्ते मकानों की उपलब्धता लगातार घटी

भारत में किफायती घरों का संकट अब गंभीर आर्थिक और सामाजिक मुद्दा बनता जा रहा है। एक समय ऐसा था जब बड़े शहरों में मध्यम वर्ग और नौकरीपेशा लोगों के लिए बजट फ्लैट आसानी से उपलब्ध हो जाते थे, लेकिन अब स्थिति तेजी से बदल चुकी है। रियल एस्टेट बाजार में सस्ते मकानों की हिस्सेदारी लगातार कम हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार कुछ वर्षों पहले तक कुल नए प्रोजेक्ट्स में बजट हाउसिंग की हिस्सेदारी काफी मजबूत थी, लेकिन अब यह घटकर बेहद कम रह गई है। इसका सीधा असर उन परिवारों पर पड़ रहा है जो सीमित आय में अपना घर खरीदने का सपना देखते हैं। महानगरों के अलावा टियर-2 शहरों में भी घरों की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। बिल्डर्स अब अधिक मुनाफे वाले प्रीमियम और लग्जरी प्रोजेक्ट्स पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, जिसके कारण कम कीमत वाले मकानों की संख्या घटती जा रही है। निर्माण सामग्री की बढ़ती कीमत, जमीन का महंगा होना और बैंक लोन की लागत में वृद्धि ने भी स्थिति को और जटिल बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले वर्षों में मध्यम वर्ग के लिए घर खरीदना और कठिन हो सकता है।

लाखों आवासीय परियोजनाएं वर्षों से अधूरी

देशभर में बड़ी संख्या में आवासीय परियोजनाएं वर्षों से अधूरी पड़ी हैं, जिससे लाखों खरीदार प्रभावित हो रहे हैं। कई लोगों ने अपनी जमा पूंजी और बैंक लोन के सहारे फ्लैट बुक किए थे, लेकिन समय पर प्रोजेक्ट पूरे नहीं हो सके। ऐसे में खरीदारों को किराया और ईएमआई दोनों का बोझ उठाना पड़ रहा है। रियल एस्टेट क्षेत्र के जानकारों के अनुसार करीब साढ़े चार लाख किफायती मकान लंबे समय से निर्माणाधीन स्थिति में अटके हुए हैं। इन प्रोजेक्ट्स के अधूरे रहने के पीछे वित्तीय संकट, मंजूरी में देरी और निर्माण लागत बढ़ना प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं। कई छोटे डेवलपर्स फंडिंग की कमी के कारण काम पूरा नहीं कर पा रहे हैं। वहीं कुछ परियोजनाएं कानूनी विवादों में फंस गई हैं। सरकार और नियामक संस्थाओं द्वारा समय-समय पर राहत योजनाएं घोषित की गईं, लेकिन उनका असर सीमित ही दिखाई दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अधूरे प्रोजेक्ट्स को जल्द पूरा नहीं किया गया तो खरीदारों का भरोसा और कमजोर होगा। इससे रियल एस्टेट सेक्टर की गति पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। कई शहरों में खरीदार अब निवेश करने से पहले डेवलपर की विश्वसनीयता और परियोजना की स्थिति को लेकर ज्यादा सतर्क हो गए हैं।

मध्यम वर्ग पर बढ़ा आर्थिक दबाव

किफायती घरों की कमी का सबसे बड़ा असर मध्यम वर्ग और युवा नौकरीपेशा लोगों पर पड़ रहा है। महानगरों में बढ़ती प्रॉपर्टी कीमतों के कारण अब साधारण परिवारों के लिए घर खरीदना बेहद कठिन हो गया है। पहले जहां सीमित बजट में छोटे फ्लैट उपलब्ध हो जाते थे, वहीं अब उसी कीमत में घर मिलना लगभग असंभव होता जा रहा है। ब्याज दरों में वृद्धि ने होम लोन की ईएमआई भी बढ़ा दी है, जिससे लोगों की आर्थिक योजना प्रभावित हो रही है। कई युवा परिवार अब किराए के मकानों में लंबे समय तक रहने को मजबूर हैं। रियल एस्टेट विशेषज्ञों का कहना है कि आय की तुलना में मकानों की कीमतें कहीं अधिक तेजी से बढ़ी हैं। इसके कारण मांग होने के बावजूद बिक्री प्रभावित हो रही है। कई लोग डाउन पेमेंट की व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं, जबकि कुछ खरीदार बढ़ती ईएमआई से बचने के लिए घर खरीदने का फैसला टाल रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार और बैंक मिलकर बजट हाउसिंग के लिए विशेष योजनाएं लागू करें तो स्थिति में सुधार आ सकता है। साथ ही डेवलपर्स को भी किफायती प्रोजेक्ट्स पर ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है।

बिल्डर्स का झुकाव महंगे प्रोजेक्ट्स की ओर

रियल एस्टेट बाजार में पिछले कुछ वर्षों के दौरान एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। अधिकांश डेवलपर्स अब लग्जरी और प्रीमियम हाउसिंग प्रोजेक्ट्स पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं। इसका कारण इन प्रोजेक्ट्स में अधिक मुनाफा माना जा रहा है। महंगे फ्लैट्स और हाई-एंड टाउनशिप की मांग बड़े शहरों में लगातार बढ़ी है, जिससे बिल्डर्स ने बजट हाउसिंग से दूरी बनानी शुरू कर दी। विशेषज्ञों के अनुसार कम कीमत वाले प्रोजेक्ट्स में लागत और मुनाफे का संतुलन बनाना मुश्किल होता जा रहा है। जमीन की कीमत, श्रम लागत और निर्माण सामग्री महंगी होने से डेवलपर्स को सस्ते मकान बनाना चुनौतीपूर्ण लग रहा है। इसके अलावा नियामकीय प्रक्रियाओं और मंजूरियों में देरी भी परियोजनाओं की लागत बढ़ा देती है। ऐसे में कई कंपनियां हाई-मार्जिन प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता दे रही हैं। हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि बजट हाउसिंग सेक्टर की अनदेखी जारी रही तो भविष्य में शहरी आवास संकट और गंभीर हो सकता है। सरकार से उम्मीद की जा रही है कि वह टैक्स राहत, सब्सिडी और आसान वित्तीय सहायता के जरिए डेवलपर्स को किफायती घर बनाने के लिए प्रोत्साहित करेगी।

सरकारी योजनाओं से अब भी बड़ी उम्मीदें

केंद्र और राज्य सरकारें समय-समय पर आवास योजनाओं के जरिए आम लोगों को राहत देने की कोशिश करती रही हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी पहल ने लाखों लोगों को लाभ पहुंचाया, लेकिन तेजी से बढ़ती मांग के मुकाबले यह प्रयास अभी पर्याप्त नहीं माने जा रहे। विशेषज्ञों का कहना है कि शहरी क्षेत्रों में किफायती घरों की जरूरत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में केवल सरकारी योजनाएं ही नहीं बल्कि निजी क्षेत्र की भागीदारी भी जरूरी होगी। सरकार यदि निर्माण क्षेत्र को टैक्स में राहत दे और जमीन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया आसान बनाए तो बजट हाउसिंग को नई गति मिल सकती है। इसके साथ ही बैंकों को भी सस्ती ब्याज दरों पर होम लोन उपलब्ध कराने के लिए विशेष योजनाएं शुरू करनी चाहिए। कई विशेषज्ञ यह भी सुझाव दे रहे हैं कि अधूरे प्रोजेक्ट्स को पूरा करने के लिए अलग फंड बनाया जाए ताकि खरीदारों को राहत मिल सके। सरकार और डेवलपर्स के बीच बेहतर तालमेल से ही इस संकट का समाधान संभव माना जा रहा है। आने वाले वर्षों में शहरीकरण बढ़ने के साथ सस्ते मकानों की मांग और अधिक बढ़ सकती है।

आवास संकट बना बड़ी आर्थिक चुनौती

देश में बढ़ता आवास संकट अब केवल रियल एस्टेट सेक्टर का मुद्दा नहीं बल्कि व्यापक आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है। शहरों में बढ़ती आबादी, सीमित जमीन और महंगे निर्माण ने सामान्य परिवारों के लिए घर खरीदना कठिन बना दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किफायती हाउसिंग को प्राथमिकता नहीं दी गई तो सामाजिक असमानता और बढ़ सकती है। बड़ी संख्या में लोग किराए के मकानों पर निर्भर रहेंगे और शहरी क्षेत्रों में आवासीय दबाव लगातार बढ़ेगा। इससे जीवन स्तर और आर्थिक स्थिरता दोनों प्रभावित हो सकते हैं। रियल एस्टेट सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है और लाखों लोगों को रोजगार भी देता है। ऐसे में इस क्षेत्र में संतुलित विकास बेहद जरूरी है। सरकार, बैंक और डेवलपर्स यदि मिलकर दीर्घकालिक रणनीति तैयार करें तो बजट हाउसिंग को फिर से मजबूती मिल सकती है। फिलहाल आम लोगों की नजर इस बात पर टिकी है कि आने वाले समय में क्या सस्ते घरों का सपना फिर से हकीकत बन पाएगा या नहीं।

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