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SC ने सरमा हेट स्पीच याचिका खारिज
मामला असम हाईकोर्ट को भेजा गया
याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज, हाईकोर्ट से आगे विचार
16 Feb 2026, 02:39 PM
Assam -
Guwahati
Reporter :
Mahesh Sharma
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Guwahati असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ दायर हेट स्पीच याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की है। याचिका में सरमा के कथित ‘मिया मुस्लिम’ बयान और सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को आधार बनाया गया था। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उनके बयानों से समुदाय विशेष के बीच नफरत और भय का माहौल पैदा हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए इसे असम हाईकोर्ट को भेज दिया। न्यायालय ने कहा कि सीधे हस्तक्षेप की बजाय मामले की स्थानीय अदालत में सुनवाई होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका केवल वरिष्ठ वकीलों के लाभ के लिए दायर की गई प्रतीत होती है और इसे न्यायालय के प्राथमिक कार्यभार को ध्यान में रखकर निपटाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट में कहा कि असम के मुख्यमंत्री के खिलाफ SIT रिपोर्ट तैयार करना मुश्किल होगा। उन्होंने दावा किया कि मामला केवल राजनीतिक लाभ के लिए हवा में उठाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और निर्देश दिया कि संबंधित याचिका हाईकोर्ट में विचाराधीन हो।
याचिका कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) के नेता एनी राजा द्वारा दायर की गई थी। उनका कहना था कि मुख्यमंत्री के बयान से राज्य में धार्मिक असंतोष फैल सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मामले को राज्य उच्च न्यायालय के समक्ष भेजते हुए कहा कि पहले याचिकाकर्ता को स्थानीय अदालत में उचित प्रक्रियाओं के तहत आगे बढ़ना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वे सीधे हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं और स्थानीय न्यायपालिका के निर्णय का सम्मान करते हुए मामला असम हाईकोर्ट को भेजा गया है। न्यायालय ने यह भी जोर दिया कि राज्य और केंद्र सरकार के कामकाज में हस्तक्षेप तभी किया जाना चाहिए जब कानून का उल्लंघन स्पष्ट हो और तुरंत कार्रवाई जरूरी हो।
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला असम में मुख्यमंत्री सरमा के पक्ष में एक महत्वपूर्ण संकेत है। याचिका खारिज होने और हाईकोर्ट भेजे जाने से राजनीतिक वातावरण में स्थिरता बनी रह सकती है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि उच्च न्यायालयों का प्राथमिक उद्देश्य कानून के अनुसार प्रक्रिया सुनिश्चित करना है।
सुप्रीम कोर्ट की इस कार्रवाई के बाद अब मामला असम हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए निर्धारित किया जाएगा। वहां पर याचिकाकर्ता और प्रतिवादी दोनों पक्षों को अपनी दलीलें रखने का अवसर मिलेगा। राजनीतिक और सामाजिक विशेषज्ञ मानते हैं कि हाईकोर्ट की सुनवाई राज्य में कानून और व्यवस्था के नजरिए से महत्वपूर्ण साबित होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए इसे असम हाईकोर्ट को भेज दिया। न्यायालय ने कहा कि सीधे हस्तक्षेप की बजाय मामले की स्थानीय अदालत में सुनवाई होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका केवल वरिष्ठ वकीलों के लाभ के लिए दायर की गई प्रतीत होती है और इसे न्यायालय के प्राथमिक कार्यभार को ध्यान में रखकर निपटाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट में कहा कि असम के मुख्यमंत्री के खिलाफ SIT रिपोर्ट तैयार करना मुश्किल होगा। उन्होंने दावा किया कि मामला केवल राजनीतिक लाभ के लिए हवा में उठाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और निर्देश दिया कि संबंधित याचिका हाईकोर्ट में विचाराधीन हो।
याचिका कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) के नेता एनी राजा द्वारा दायर की गई थी। उनका कहना था कि मुख्यमंत्री के बयान से राज्य में धार्मिक असंतोष फैल सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मामले को राज्य उच्च न्यायालय के समक्ष भेजते हुए कहा कि पहले याचिकाकर्ता को स्थानीय अदालत में उचित प्रक्रियाओं के तहत आगे बढ़ना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वे सीधे हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं और स्थानीय न्यायपालिका के निर्णय का सम्मान करते हुए मामला असम हाईकोर्ट को भेजा गया है। न्यायालय ने यह भी जोर दिया कि राज्य और केंद्र सरकार के कामकाज में हस्तक्षेप तभी किया जाना चाहिए जब कानून का उल्लंघन स्पष्ट हो और तुरंत कार्रवाई जरूरी हो।
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला असम में मुख्यमंत्री सरमा के पक्ष में एक महत्वपूर्ण संकेत है। याचिका खारिज होने और हाईकोर्ट भेजे जाने से राजनीतिक वातावरण में स्थिरता बनी रह सकती है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि उच्च न्यायालयों का प्राथमिक उद्देश्य कानून के अनुसार प्रक्रिया सुनिश्चित करना है।
सुप्रीम कोर्ट की इस कार्रवाई के बाद अब मामला असम हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए निर्धारित किया जाएगा। वहां पर याचिकाकर्ता और प्रतिवादी दोनों पक्षों को अपनी दलीलें रखने का अवसर मिलेगा। राजनीतिक और सामाजिक विशेषज्ञ मानते हैं कि हाईकोर्ट की सुनवाई राज्य में कानून और व्यवस्था के नजरिए से महत्वपूर्ण साबित होगी।